बेटियाँ वह दीपक है

 

नीलम उपाध्याय
के.जी.बी.वी -गोसाईगंज

 

 

 

बेटियाँ वह दीपक है
जिनसे प्रकाशित है जग सारा ॥
ससुराल मायका रौशन करती
देती है सबको सहारा ॥
फिर आज जब एक बेटी जन्मी
क्यों है मातम छाया ॥ ?
क्यों भूल गए उसके महत्व को
जिसने तुमको भी पाला
मत भूलों उसके महत्व को
जो सबको समझे अपना
बनकर बेटी भाभी माँ वो
साकार करे हर सपना ।।

रोकथाम के उपाये

 

सुमन सिंह
के.जी.बी.वी -गोसाईगंज

सर्वप्रथम माता पिता तथा समाज परिवार में लोगों को शिक्षित किया जाये । बाल विवाह के दुष्परिणाम को लोगों को बताया जाये बाल विवाह से उत्पन्न कमियों तथा इससे उत्पन्न सामाजिक आर्थिक तथा अन्य पहलुओं पर विस्तार पूर्वक समझाया जाय । आधुनिक शिक्षा एवं वैज्ञानिक विचार व् प्रगतिशील समाज के बारे में माता पिता से लेकर बच्चों तक सबको जागरूक किया जाये । कानून का भय भी जरुरी है तथा कानून को भी सख्ती दिखाना चाहिए । वैसे जागरूकता ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ।

ज़िन्दगी रुकी नहीं

 

 

ऊषा यादव -वार्डेन
के. जी.बी. वी – जमालपुर

रीना लाख मना करती रही पर रिश्तेदारों के दबाव में आकर घरवालों ने उसकी शादी केवल १२ वर्ष की आयु में कर दी। रीना के सौभाग्य से उसके ससुराल वालों ने पढ़ाई का महत्व समझा और गौना करने की जिद नहीं की । रीना इस समय जमालपुर मिरजापुर, उ. प्र. में कस्तूरबा गाँधी विधालय में कक्षा सात की छात्रा है । उसके ससुराल वाले कहते हैं । कि तुम जितना पढना चाहो , पढ़ो । रीना को पढ़ाई के अतिरिक्त सिलाई कढ़ाई का भी शौक है और वह बड़े होकर अपना ज्ञान दूसरों के साथ बाँटना चाहती है ।

हक़ है बेटियों को जीने का

 

 

सीमा गौतम
पूर्णकालिक शिक्षिका
के.जी.बी.वी, काकोरी

 

हक़ है बेटियों को जीने का,
इन्हें मरने पर न मजबूर करो ।
कम उम्र में शादी करके ,
इनके सपनों से न दूर करो ॥
बोझ समझते है लोग जिन्हें ,
साहस का भंडार हैं ये ।
जीवन कि हर समस्या को ,
सुलझाने का आधार हैं ये ॥
आधार रहे ये सदा सर्वदा ऐसा कोई
हक़ है बेटियों को जीने का
इन्हे मरने पर न मजबूर करो ।
कम उम्र में शादी करके,
इनके सपनों से न दूर करो ॥
जीवन है इनका अनमोल,
इनका बचपन न छीनो तुम ।
पढ़ा लिखाकर बेटियों को ,
आसमान छूने का हक़ दो तुम
इन्हे इनके अधिकारों से न दूर करो ।

हक़ है बेटियों को जीने का,
इन्हें मरने पर न मजबूर करो ।
कम उम्र में शादी करके ,
इनके सपनों से न दूर करो ॥
बाल विवाह है क़ानूनी अपराध
लड़के की उम्र हो २१ , तो लड़की की १८ ।
यदि इससे पहले विवाह किया तो
लग सकता है तुम पर जुर्माना ,
जेल भी हो सकती है तुमको, ऐसा न अपराध करो ।
हक़ है बेटियों को जीने का,
इन्हें मरने पर न मजबूर करो ।
कम उम्र में शादी करके ,
इनके सपनों से न दूर करो ॥

हम लड़ेंगे

 

 

नीलिमा सिंह
के.जी.बी.वी, मलीहाबाद

न अब कोई दामिनी मरे इसका कर लो प्रण
हम भोग की वजह नहीं है आज हमें इस समाज को बताना है
अब ना सहेंगी सामाजिक अत्याचार, न ही अब रोयेंगी बेटी किसी के द्वारा
हम लड़ेंगे अपने हक़ को अपना परचम लहरायेगें
सबको लड़की की ताकत दिखायेंगे ।
अब न कोई बेटी बिकेगी मजबूरियों क हाथ
शिक्षा की लौ घर- घर जलायेंगे
अज्ञानता को दूर भगायेंगे अपने अधिकारों को मांगेगे
नहीं मिला तो छीनेंगे अब नहीं मरेंगी बेटी कोई
इसका विशवास जमाना है ।

हम बेटी है तो क्या हुआ

 

 

सुमि श्रीवास्तवा
के.जी.बी.वी, मलीहाबाद

यह हमारे ग्रामीण क्षेत्रों की एक ऐसी ज्वलनशील समस्या है जिसके कारण हर वर्ष हज़ारो लड़कियॉ का जीवन अन्धकार में है । अब समय आ गया है कि हम सब आगे बढ़कर इस समस्या का निराकरण करें । इसके लिए सर्वप्रथम हमें बालिकाओं को तथा जन समुदाय को बाल विवाह से होने वाले दुष्परिणामों को बताना होगा । यह एक ऐसी सामाजिक कुरीति है जो न जाने कितनी मासूम बालिकाओं का जीवन छीन लेता है । महिलाओं को सबसे ज्यादा जागरूक करना पड़ेगा इसके लिए हमें उनके अधिकारों से अवगत करा कर इस बाल विवाह नामक सामाजिक बुराई को दूर करना होगा । इसके लिए अपने स्तर से लगातार प्रयास किये जा रहे हैं । समुदाय से जुड़ कर अब तक हो रहे इस बाल विवाह को रोक कर हर दिन लड़कियो को मरने से बचाना होगा ।

 

हम बेटी है तो क्या हुआ

हमारे भी हजारों सपने है
हम भी जीना चाहते है
हमको भी जीने दो
हम बेटी है तो क्या हुआ
हमारे भी हजारों सपने है
न करो मेरा बाल विवाह
न हमारा बचपन छीनो
हम बेटी है तो क्या हुआ
हम भी जीना चाहते है
न करो कन्या भ्रूण हत्या
हम भी जीवन कि है कर्णधार
माँ एक बार तो बेटी  के लिए लड़ो
हम कभी निराश नहीं करेंगे
क्योंकि हम बेटी है तो क्या हुआ
हम भी जीना चाहते है ।

EMPOWER THEM

 

 

Pratima Srivastava
Principal, Vidyasthali School

Child slavery can come in many guises, whether its children who are forced to beg by others for profit through violence, those who have to work to pay their parents’ debts.But we rarely think of slavery when it comes to child marriage.

The impact of marriage on children’s education, and their physical and psychological health is increasingly highlighted. Nevertheless, child marriage remains a widely culturally accepted practice in many corners of the globe. Latest figures suggest that 11 per cent of women aged between 20 and 24 worldwide were married before reaching the age of 15.2 Girls who are forced to marry are committed to being in slavery like marriages for the rest of their lives.

Girls who are victims of servile marriages experience domestic servitude, sexual slavery and suffer from violations to their right to health, education, non-discrimination and freedom from physical, psychological and sexual violence. Child marriage is a violation of all the rights of the child. It forces children, particularly girls, to assume responsibilities for which they are often physically and psychologically not prepared for. Girls who are forced to marry face a life of violence in the home where they are physically and sexually abused, suffer from inhuman and degrading treatment and ultimately slavery.

Early marriage also impacts on girls’ right to education, health, and participate in the decisions that affect them. Girls who marry early often drop out of school, significantly reducing their ability to gain skills and knowledge to make informed decisions and to earn an income.

An obstacle to girls’ and women’s empowerment, it also hinders their ability to lift themselves out of poverty. Child brides are more likely to get pregnant at an early age and, as a result, face higher risk of maternal death and injury due to early sexual activity and childbearing.

Let us unite for their empowerment when they themselves can raise their voices and say firmly, No girl should be forced to marry. No girl should be committed to servile marriage, domestic servitude and sexual slavery. No girl should suffer from violations to their right to health, education, non-discrimination and freedom from physical, psychological and sexual violence. NOT A SINGLE ONE.

भारतीय नारी : दासता या विवशता : एक परिप्रेक्ष्य

 

Suman Dwivedi
Teacher, Senior School, Study Hall

(this article is in devnagiri script in unicode, please ensure that your browser supports unicode script)

प्यारे मित्रो !

वैशवीकरण के इस युग में जहाँ एक ओर हम तरक्की ओर विकास की बातें करते हैं। स्त्री-पुरुष समानता के बातें करते हैं। स्त्रियों को पुरुषों के साथ कदमताल करते पाते है या दिखाते हैं। इस विषय के तह में जाय तो हम पाते है कि स्थिति हमेशा से ऐसी नहीं रही हैं । इसके लिए हमारे देश की बच्चियों ने , स्त्रियों ने , काफी क़ुर्बानियाँ दी, संघर्ष किया और कर रही है,परन्तु दासता की बेड़िया इतनी सघन हैं, कि काटे नहीं कट रही हैं। भारत मैं नारियों की स्थिति सदियो से दयनीये रही हैं। कभी बालविवाह तो कभी पर्दा प्रथा कभी सती प्रथा के नाम पर उसे प्रताड़ित किया जा रहा है और किसी की भी द्रष्टि कभी इस ओर नहीं गयी कि जिस व्यक्ति से नारी तरह तरह की सम्बंधो से जुड़ती हैं। उसी क्रूरता से निजात पाने के लिए संघर्ष भी करती हैं। हमारी सभ्यता कि पहली इकाई परिवार को ही लीजिये। जिस घर को नारी सबसे ज्यादा सहेज सँवार कर रखती हैं, साड़ी प्रताड़नाएं, क्रूरताएं, लंपटाताएं,शारीरिक दंड की स्थितियाँ वाही से शुरू होती हैं। हम विश्व की किसी भी हिस्से मे जाए हमें एसे प्रमाणिक तथ्य मिलेँगे जहाँ पुरूषों नें अपनी अकर्मण्यता से, कट्टरपथिता से, अज्ञानता से ,पक्षधरता से नारी का शोषण न किया हो। कभी शारीरिक संरचना तो कभी संतानोपत्ति और कभी देह सुख देने वाली स्वाभाविक स्थतियों को आधार बनाकर उसका दुरुपयोग न किया हो। इस पुरुषवादी सोंचने पहले स्त्रियों की घेरबंदी की फिर उन्हें घेरों के घेरों में कैद कर दिया। जबकि देखा जाए तो नारी की तीनों शक्तियाँ पुरुषों की भी थी। जिन्दा रहनें, आगें बढ़ने और सुख प्राप्त करने की शक्ति। लेकिन पुरुषों ने इस शक्ति को अपनी सम्पात्ति बनाकर प्रयोग किया।

भारत में महाभारत काल से रामायण काल पर द्रष्टिपात करे तो पुरुषतुल्य मानवरुपधारी देव और उसकी छाया मात्र देवी की स्थति शोचनीय नहीं दयनीय भी हैं, कभी सोचा आपनें कि क्यों एक स्त्री को देवी की तरह पूजा जानें लगा? क्यों सारी मर्यादायें सारे रीति-रिवाज, परम्पराये उसी के लिए बनीं? क्यों उसकी परवरिश को आधार बनाकर उसे नियम अनियम में बाँध दिया गया? क्यों उसपर होने वाले आत्याचारों की फेहरिस्त इतनी लम्बी हैं? कभी सोचा हैं कि क्यों एक स्त्री ही पुरुष द्वारा त्यागी जाती हैं? क्यों राम जी की ही चरणधूलि से अहिल्या तरित हुई? क्यों शकुंतला को दुष्यंत पहचान न सके? क्यों पालि प्राकृत कि ज्ञाता विदुषियों को अनपढ़ गॅवार कहा दिया गया? क्यों आज समाज में एक विधवा के एकाकी जीवन जीने पर तमाम प्रशन चिन्ह लगाये जाते हैं? क्यों दहेज के आभाव में एक कुँवारी को नित नई परिक्षाओ से गुजरना पड़ता हैं? क्यों? क्यों? और क्यों ??”अष्ट वर्षा भवत् गौरी “की परम्परा आज भी देश में फल फूल रही हैं?क्यों नारी देवी तुल्य हैं? और उसके पिता का उसके लिए यही उपदेश है कि “पति के रूष्ट होने पर भी तुम रोष न करना। पति के कुल में तुम्हारा दासत्व उचित हैं।”
विचित्र हैं किन्तु सत्य हैं,कि विगत हजारो के इतिहास में कभी भी, किसी ने भी नारी कि आर्थिक स्थति कि ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। इसी के चलते देश कि बेटियां, बहने और माँओं को इसी अर्थव्यवस्था के चलते समाज में हीन भावना और दासत्व से ग्रसित रहना पड़ा। दासप्रथा के मूल में नारी के प्रति समाज की आर्थिक असहिष्णुता है। मै तो कहता हू वह सामाजिक सोंच है जो स्त्री और पुरुष को अलग अलग नियमों के खाकों में जकड़ देती है और पुरुष कभी देख और सुन ही नहीं पता कि स्त्री के भीतर कितना और कैसा कैसा दर्द रिसता है। भावनात्मक वेदना तो दूर की बात है मनुष्यता के नाते जो गहरिसंवेदना उपजनी चाहिए नहीं उपजती।

विडम्बना यही है कि स्वतंत्र भारत में नारी का बाजारीकरण किया जा रहा है। प्रसाधन की गुलामी, कामुक संप्रेषण और विज्ञापनो के जरिये उसका व्यावसायिकरण किया जा रहा है। कभी अंग कि भंगिमाओं से, कभी मुद्राओं से,कभी स्पर्श से,कभी यौवन से तो कभी सहवास से कितने भयंकर परिणाम विकृतियों के रूप सामने आये हैं। सोचिये जिस्म बेंचकर पेट पालने की विवशता, अनचाहे गर्भ का डर,अवैध संतानो का जन्म। कभी सोंचा है अपने किसी भी नारी ने स्वेच्छा से वैश्यावृत्ति अपनाई हो। सोंचकर भी डर लगता है। इसी के चलते पुरुषवादी समाज ने नारी को सोने चाँदी के आभूषणों कि तरह सौदा किया। इसी के चलते मासूम बच्चियो के साथ बलात्कार जैसा जघन्य अपराध सामने आता हैं। यही नहीं बलात्कार के बाद जिन्दा जला देने जैसी निर्ममता से किसी की रुह तक नहीं काँपती क्यों आज भी पुरूषों के लिए खुले दरवाजे और स्त्रियों के लिए कोई रोशनदान नहीं? मैं कहती हूँ स्त्री नारी होती नहीं बनाई जाती हैं। हम सबको यह संकल्प लेना होगा कि अब और नहीं, अब किसी भी इंद्र के पाप का दंड अब किसी भी आहिल्या को नहीं भरना होगा।

Let’s Be Sensitive

 

 

Utpal Misra
Director, Center for Learning

Young girls dream of only toys, good food, good cloths and lot of time to play. But on contrary, from a very tender age they are taught to work with utensils, to cook food, to do daily chores and no time to study. Parents in the rural areas or lower income groups to be more specific are still raising girls only to get them married to someone who may or may not be able to take care of their daughter.

Child marriage is an extension of female foeticide. Only difference being that in the latter the girl child is not allowed to survive and in the former the girl is considered as a burden to be waived off to the soonest possible. As the girl develops senses she is being trained to handle the daily chores as a training to slavery. This forced slavery remains with the girl throughout her life and makes her a bonded labourer to suffer with physical and emotional abuses at her place and then being married at a tender age to face additional burden of sexual abuse and of early pregnancy when her own body is not ready to bear the burden of a baby.

The question that arises is that what can be done to stop this hidden crime? Apart from the measures taken by the government it is essential for colleges and other institutions like non- government organizations to make certain moves. It is advisable to approach such villages and districts and educate the parents about the ill- effects of child marriage. It may be hard to make them understand easily but you never know that which activity or step of yours can change their minds at any point of time. “KAUN KEHTA HAI AASMAN MEIN CHHED HO NAHIN SAKTA, EK PATTHAR TO TABIYAT SE UCHCHALO YAARON.”

Women: Child marriage is an issue on which it is important to sensitise the parents in the first place and more importantly the mothers. Mother is the person who understands both the physical and the mental developmental stages of a girl and can only explain the ill effects of child marriage to their husbands. If only the mother becomes firm not to get married their daughter at a tender age it can save the life of so many young girls. Girls look to their mother as their role model and they follow them. Elder sisters who has been a victim of such practise must come forward to save their younger siblings.

Men: Men must come forward to reject the practices that subordinate women and girls and subject them to violence and so uproot child marriage. Develop an awareness of the cultural supports for violence against women. Develop the ability to recognize and defy myths which support violence against women.

Fathers don’t shy from your duties towards your daughter and boys be ready to say ‘no’ to child marriage, rise up and work towards getting a mature life partner than to marry an underage girl and treat her like slave.

The most powerful tool

Bani Malhotra

 

Bani Malhotra
Head Mistress, Junior School
Study Hall School

“Educating girls is one of the most powerful tools to prevent child marriage” The conditions of girls who are forced into the institution of marriage, in the name of customs and tradition, have to bear the degrading repercussions of it for the rest of their lives. The consequences that follow child marriage cause irreversible damage to them. Numerous things are at stake in such an abysmal situation; the child’s education is sacrificed, girls become more vulnerable to domestic violence and early pregnancies, which significantly affect their emotional and physical health. To prevent child marriages we should strive to empower girls with information and support networks and most importantly, enhance their access to education that would in the long haul provide them with the means to financially support themselves. To strengthen the impact of this movement, it is imperative to educate & involve parents and society members as well. To stop this social menace, the law must make registration of all marriages mandatory whether at the village, city, state or national level. I believe that stringency of punishment should be the next important element in the strategy to tackle this menace. This social evil has greatly degraded the status of women in the society. We need to STAND UP and support every attempt to irradiate this undignified and shameful practice in our culture that has been crushing the progress of this nation for decades now.